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कुलदेवी

आस्था, स्मृति और पीढ़ियों को जोड़ती परंपरा।

हमारी जड़ों से एक कहानी

आस्था जो हमें जोड़ती है

चौहान वंश और लुहाच गोत्र की कुलदेवी माता शाकम्भरी (आशापुरा) की पावन गाथा श्रद्धा का अटूट हिस्सा है। परंपरा के अनुसार, लक्ष्मण सिंह चौहान सांभर से नाडोल पहुंचे और देवी के आशीर्वाद से एक नए राज्य के शासक बने।

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आस्था जो हमें जोड़ती है
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लुहाच गोत्र की कुलदेवी माता शाकम्भरी को माता आशापुरा अथवा आशापूर्णा भी कहा जाता है।

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पारंपरिक वृतांत के अनुसार, लक्ष्मण सिंह चौहान ने सांभर छोड़कर नाडोल की रक्षा की और बाद में वहां के शासक बने।

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मनोकामना पूर्ण होने पर उन्होंने नाडोल में माता आशापुरा का मंदिर बनवाया।

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कुलदेवी माता शाकम्भरी और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

लुहाच गोत्र चौहान वंश से संबंधित होने के कारण माता शाकम्भरी (आशापुरा) को अपनी कुलदेवी मानता है। सांभर के शासक वाक्पतिराज प्रथम के कनिष्ठ पुत्र लक्ष्मण सिंह महत्वाकांक्षी थे, परंतु पारिवारिक कलह से बचने के लिए उन्होंने सांभर त्यागकर पाली की ओर प्रस्थान किया।

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नाडोल आगमन और दायित्व प्राप्ति

नाडोल में नीलकंठ महादेव मंदिर के पुजारी के सहयोग से लक्ष्मण सिंह को नगर अध्यक्ष बनाया गया। उस समय क्षेत्र पर कमजोर शासन के चलते मेद जनजाति के निरंतर आक्रमण होते रहते थे।

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माता का वरदान और नाडोल का राज्यारोहण

मेदों के आक्रमण का मुकाबला करते हुए घायल लक्ष्मण सिंह को स्वप्न में माता शाकम्भरी ने राज्य प्राप्ति का वरदान और सेना निर्माण का उपाय बताया। इसके बल पर उन्होंने मेदों को पराजित किया और सन् 958 ईस्वी में नाडोल के राजा बने।

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माता आशापुरा मंदिर की स्थापना

इच्छा पूर्ण होने पर राजा लाखणसी ने माता आशापुरा का मंदिर बनवाया, जहां विशेष पर्वों पर मेले लगते हैं। यह स्थल रानी रेलवे स्टेशन से लगभग 21 किलोमीटर दूर स्थित बताया गया है।

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