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शहीद दादा बरदेशराम का इतिहास

2021-08-26

जड़वा गाँव की यह पारंपरिक गाथा चौहान और तंवर पक्षों के पुराने संघर्ष को सामने लाती है। इसमें लाल सिंह के परिवार की चुनौतियाँ, दादा बरदेशराम का बलिदान और नान्धा गाँव की स्थापना से जुड़ी जनश्रुति दर्ज है।

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दिनेश लुहाच के अनुसार जड़वा गांव में पूर्वजों और तंवरों के बीच भीषण संघर्ष हुआ था।

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संघर्ष में लाल सिंह के बड़े बेटे बरदेश राम ने वीरतापूर्वक लड़ते हुए अपने प्राण दिए।

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श्रापों के बाद लाल सिंह ने स्थान बदलकर लुहाच गोत्र अपनाया और नान्धा में बस गए।

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जड़वा के इतिहास की खोज

एसडीएम दिनेश लुहाच ने लुहाच इतिहास से जुड़े तथ्यों पर चर्चा की। उन्होंने जड़वा गांव में पूर्वजों और तंवर राजपूतों के बीच हुए संघर्ष की जानकारी साझा की, जो नान्धा की बही से मेल खाती है।

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जड़वा का संघर्ष और बरदेश राम का बलिदान

जड़वा में लाल सिंह चौहान के परिवार और तंवर पक्ष के बीच भारी रंजिश के बाद भीषण आगजनी और युद्ध हुआ। लाल सिंह के पराक्रमी पुत्र बरदेश राम वीरतापूर्वक लड़ते हुए शहीद हो गए और गांव उजड़ गया।

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शाकम्भरी माता और विधवा का श्राप

परंपरा के अनुसार लाल सिंह को माता शाकम्भरी से गोत्र बदलने तक खारे पानी का श्राप मिला था। इसके अतिरिक्त जड़वा के युद्ध के बाद एक विधवा ने उन्हें वंश न चलने का श्राप दिया।

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नान्धा की स्थापना और लुहाच गोत्र

श्रापों के भय से लाल सिंह ने जड़वा छोड़कर खेड़ा पर पड़ाव डाला और लुहाच गोत्र अपनाया। यही स्थल बाद में नान्धा गांव बना, जहां लोग कालांतर में निचले इलाकों में बसते चले गए।

हर परिवार की कहानी मायने रखती है।

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