ज्ञानपुर
मुरादाबाद · उत्तर प्रदेश
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में बसा ज्ञानपुर मुख्य रूप से लुहाच गोत्र का गाँव है। लोक स्मृतियों और सामुदायिक परंपरा के मुताबिक, इस बस्ती की नींव कभी जोहरी ने रखी थी, जिसके बाद यह गाँव धीरे-धीरे फलता-फूलता चला गया।
ज्ञानपुर की लगभग 90% आबादी लुहाच गोत्र से जुड़ी है और यहाँ की मुख्य फसल गन्ना है।
परंपरा के अनुसार, नाँधा से चले जोहरी ने इस क्षेत्र में आकर गाँव की नींव रखी थी।
कालान्तर में ज्ञानपुर से छज्जा नंगला और दरियापुर सहित कई अन्य गाँवों में विस्थापन हुआ।
गाँव का परिचय और भूगोल
ज्ञानपुर मुरादाबाद जिला मुख्यालय से 10 किलोमीटर दूर स्थित एक मध्यम आबादी वाला गाँव है। यहाँ की लगभग 90% आबादी लुहाच गोत्र की है और गाँव पक्की सड़कों से आसपास के क्षेत्रों से जुड़ा है।
भूमि और बुनियादी ढाँचा
गाँव का कुल रकबा लगभग 6000 बीघा है, जिसमें से अधिकांश भूमि लुहाच समुदाय के पास है और मुख्य पेशा खेती है। गाँव में स्कूल, मंदिर, पंचायत घर और आँगनबाड़ी केंद्र की सुविधा उपलब्ध है।
प्रवासन की शुरुआत
परंपरा के अनुसार, जोहरी नाँधा से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ओर निकले पहले समूह में शामिल थे। वे दुलारो राम के तीन पुत्रों में से एक थे।
कुचेसर और नंगला उग्रसैन
तीनों भाई कुचेसर के पास पहुंचे और राजा से खेती व रहने के लिए जमीन मांगी। उग्रसैन वहीं एक नंगले में बस गए, जिसे बाद में नंगला उग्रसैन के नाम से जाना गया।
ज्ञानपुर की स्थापना
होराम का परिवार भंड़ोली में रुका, जबकि जोहरी और बीरम सिंह आगे बढ़कर ज्ञानपुर पहुंचे। जोहरी ने यहाँ बसकर गाँव की नींव रखी, इसलिए इसे लुहाच का खेड़ा भी कहा जाता है।
एक अन्य वृत्तांत
एक अन्य विवरण के अनुसार, जोहरी के बेटों ने पाँच गाँवों की पेशकश अस्वीकार कर मुरादाबाद के पास एक बड़ी झील किनारे डेरा डाला। बाद में यही बस्ती ज्ञानपुर गाँव के रूप में विकसित हुई।
विस्थापन और वर्तमान पीढ़ी
ज्ञानपुर से आगे चलकर छज्जा नंगला, मुंडा खेड़ी और दरियापुर जैसे कई गाँवों में विस्थापन हुआ। वर्तमान में ज्ञानपुर में लुहाच परिवार की 40वीं पीढ़ी का उल्लेख मिलता है।
01गाँव का परिचय और भूगोल
ज्ञानपुर गाँव का इतिहास
ज्ञानपुर गाँव पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले का मध्यम आबादी का गाँव है। यह जिला मुख्यालय से 10 किलो मीटर दूर स्थित है। इसके पूर्व में सिकंदरपुर, चौधरपुर, पश्चिम में उचेती,हकीमपुर, मिठनपुर,उत्तर में जेवड़ी, जेवड़ा, सलेमपुर और दक्षिण में शाहआलमपुर, बहलोलपुर मिल्क और तैया गाँव की सीमा लगती है। इन सब सीमावर्ती गाँवों से पक्का सड़क से संपर्क है। इस गाँव का खेड़ा लुहाच का खेड़ा है। इसकी कुल आबादी लगभग 1800 लोगों की है जिसमें से लगभग 1600 लोग लुहाच गौत्र के हैं। लुहाच जनसंख्या गाँव की कुल आबादी का 90% है।
02भूमि और बुनियादी ढाँचा
इस गाँव का कुल रकबा लगभग 6000 बीघा है जिसमें से 5500 बीघा लुहाच गौत्र के लोगों के पास है। लुहाच गौत्र के लोग बहुत मेहनतकस हैं जिनका शदियों से मुख्य पेश खेती बाड़ी रहा है। यही कारण है कि यहाँ के लुहाच गौत्र के लोगों ने आस पास के गाँवोंकी जमीन खरीद ली। इस गाँव में लुहाच के अलावा बाजवा गौत्र के लोग भी रहते हैं लेकिन उनकी आबादी बहुत कम है। गन्ना यहाँ की मुख्य फसल है जिसकी पास के चीनी मील में पिराई होती है। यह गाँव राष्ट्रीय राजमार्ग से महज 10 किलो मीटर उत्तर में पड़ता है। इस गाँव में 1 मंदिर, 1 प्राथमिक स्कूल, 1 माध्यमिक स्कूल, 1 पंचायत घर और 1 अंगनबाड़ी केंद्र है।
03प्रवासन की शुरुआत
इस गाँव के प्रथम लुहाच पुरुष जोहरी नाँधा से पश्चिमी उत्तरप्रदेश के लिए निकले पहले जत्था का हिस्सा थे। नाँधा वंशावली की 29 वीं पीढ़ी के दुलारो राम के तीन बेटे थे।
04कुचेसर और नंगला उग्रसैन
तीनों भाई पहले जत्थे के तहत यमुना पर कर कुचेसर के पास नली हुसैनपर पहुँच गए। यहाँ आकर पता चला कि कुचेसर रियासत का राजा दलाल गौत्र से हैं और राजा के पूर्वज हरियाणा से आए थे। तीनों भाइयों ने राजा से अपनी रियासत में रहने के लिए जगह और खेती के लिए जमीन मांगी। राजा ने यहाँ से कुछ किलो मीटर आगे एक नंगला में डेरा डालने की इजाजत दे दी। तीनों भाई इस नंगला पर रुक गए। जगह पसंद आ गई। तीनों भाइयों ने योजना बनाई कि एक भाई यहाँ रुक जाए और बाकी के दो भाई और आगे चल कर कोई दूसरी जगह जाकर देखते हैं। इस प्रकार उग्रसैन इसी जगह पर रुक गया। उस समय यहाँ कोई बसती नहीं थी। धीरे धीरे आबादी बढ़ने लगी और कालान्तर में एक गाँव का रूप ले लिया। इस लिए इस गाँव का नाम नंगला उग्रसैन रखा गया।
05ज्ञानपुर की स्थापना
होराम और जोहरी के परिवार का कारवाँ यहाँ से और आगे बढ़ा और बुलन्दशहर के पास भंडोली पहुँच गया। जगह रहने लायक देख कर होराम ने यही बसने का मन बना लिया। इस प्रकार होराम का परिवार यहीं पर बस गया। होराम के दो बेटे थे। उनके नाम हेत राम और बीरम सिंह थे। हेत राम यहीं पर रह गया जब कि उसका भाई बीरम सिंह अपने ताऊ जोहरी के साथ आगे बढ़ गया। दोनों परिवार यहाँ से आगे गहना होते हुए मुरादाबाद जिले के ज्ञानपुर गाँव में पहुँच गए। जोहरी यहीं पस बस गया। उस समय यहाँ कोई आबादी नहीं थी। जोहरी ने ही इस गाँव की नींव रखी थी । इस लिए ज्ञानपुर का खेड़ा लुहाच का खेड़ा माना जाता है।
06एक अन्य वृत्तांत
एक अन्य मत के अनुसार जोहरी के चारों बेटों ने अंग्रेज हकूमत के लिए बहुत काम किया था। इससे खुश होकर अंग्रेज हकूमत ने इस परिवार को इनाम के रूप में मुरादाबाद और सम्भल के बीच में 5 गाँव का रकबा देना चाहा लेकिन लुहाच परिवार ने इसे लेने के लिए मना कर दिया। इस परिवार ने मुरादाबाद के पास 500 बीघा जमीन की बड़ी झील के किनारे डेरा डाल दिया और यहीं बसने का मन बना लिया। बाद में यही डेरा एक गाँव के रूप में उभरता गया। इसी गाँव को ज्ञानपुर के नाम से जाना जाने लगा।
07विस्थापन और वर्तमान पीढ़ी
ज्ञानपुर से कालान्तर में कई गाँव में विस्थापन हुआ। ये गाँव हैं छज्जा नंगला, दानशाह मिलक, बाबू खेड़ा, मुंडा खेड़ी और दरियापुर। छज्जा नंगला से फिर एक अन्य गाँव घरोंट में विस्थापन हुआ। ज्ञानपुर में इस समय लुहाच परिवार की 40 वीं पीढ़ी चल रही है।
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