खाटू श्याम
सीकर · राजस्थान
राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू श्याम एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। यह पावन कस्बा खाटू श्याम बाबा के भव्य मंदिर और बर्बरीक से जुड़ी अमर पौराणिक मान्यताओं के केंद्र के रूप में पहचाना जाता है।
कस्बे का क्षेत्रफल लगभग 30 वर्ग किलोमीटर और आबादी करीब 20,000 है।
परंपरा के अनुसार, कृष्ण के वरदान के बाद बर्बरीक का शीश खाटू में दफनाया गया और वे श्याम नाम से पूजे गए।
अभिलेख के अनुसार, 1950 ईस्वी में राधू राम लुहाच अपने परिवार के साथ सारगोठ गाँव से यहाँ आए थे।
कस्बे का भूगोल और परिचय
खाटू श्याम सीकर जिले की दांता रामगढ़ तहसील में स्थित एक धार्मिक कस्बा है। यहाँ की आबादी लगभग 20,000 है और इलाका मुख्य रूप से ट्यूबवैल सिंचाई पर निर्भर है।
धार्मिक मान्यता और बर्बरीक की कथा
महाभारत काल की मान्यता के अनुसार, भीम के पोते बर्बरीक ने कृष्ण को शीश दान में दिया था। कृष्ण ने उन्हें कलयुग में श्याम नाम से पूजे जाने का वरदान दिया और उनका शीश खाटू में स्थापित हुआ।
लुहाच परिवार का आगमन
अभिलेख के अनुसार, लुहाच गौत्र के राधू राम 1950 ईस्वी में सारगोठ गाँव से खाटू श्याम आए थे। वर्तमान में इस कस्बे में उनकी चौथी पीढ़ी निवास कर रही है।
01कस्बे का भूगोल और परिचय
खाटू श्याम गाँव का इतिहास
खाटू श्याम कस्बा राजस्थान के सीकर जिले की ताता रामगढ़ तहसील का एक मध्यम आबादी वाला धार्मिक स्थल है जो कि खाटू श्याम बाबा के मंदिर के लिए जाना जाता है। यह जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर और तहसील मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर स्थित है। इस कस्बे के पूर्व में चोमू, पश्चिम में धींगपुर, उत्तर में मंडा और दक्षिण में लामिया की सीमा लगती है। इसका सभी सीमावर्ती गाँव से पक्की सड़क से संपर्क है। इस कस्बे का क्षेत्रफल लगभग 30 वर्ग किलोमीटर है। इस कस्बे की कुल आबादी लगभग 20000 लोगों की है। लुहाच परिवार के पास महज 40 बीघा जमीन है। लुहाच परिवार कस्बे से बाहर लगभग दो किलोमीटर दूर खेतों में मकान बना कर रहता है। पूरा इलाका बरानी है जिसकी सिचाई ट्यूबवैल के पानी से फवारा प्रणाली से होती है।
02धार्मिक मान्यता और बर्बरीक की कथा
खाटू श्याम हिन्दू धर्म के लोगों की आस्था का स्थल रहा है। ऐसी मान्यता है कि महाभारत काल में महाबली भीम के पोते बर्बरीक ने युद्ध में हारते हुए पक्ष की तरफ से लड़ने का मन बनाया। जब कृष्ण को इसका पता चला तो वह उसकी परीक्षा लेने के इरादे से ब्राह्मण के भेष में बर्बरीक से एक पेड़ के सब पत्तों को तीर से भेद कर अपनी तीरंदाजी का प्रमाण देने को कहा। बर्बरीक ने एक ही तीर से यह सब कर दिखाया। कृष्ण ने सोचा कि यह तो धर्म की लड़ाई करने वाले पांडव पक्ष को हरा देगा जिससे अधर्म पक्ष के कौरवों की जीत हो जाएगी। इस लिए उसने बर्बरीक से वचन मांगा। बर्बरीक ने साधु रूप में कृष्ण को वर मांगने को कहा। कृष्ण ने वर में बर्बरीक का सिर मांगा। बर्बरीक ने कहा कि ठीक है में अपना सिर देता हूँ लेकिन पूरी लड़ाई देखना चाहता हूँ।
कृष्ण ने बर्बरीक का सिर युद्धक्षेत्र में ऊंची जगह रख दिया जिससे उसने सब लड़ाई को देखा। कृष्ण ने बर्बरीक को बदले में वरदान दिया कि कलयुग में आप को श्याम (कृष्ण का उपनाम) के नाम से पूजा जाएगा। बर्बरीक का सिर युद्ध के बाद खाटू नगर में दफनाया गया। इसी जगह को बाद में खाटू श्याम के नाम से जाना जाने लगा। खाटू श्याम बाबा की पूजा विश्व विख्यात है। सारगोठ गाँव की वंशावली पीढ़ी संख्या 36 के मुताबिक राधू राम लुहाच सपरिवार 1950 ईस्वी में खाटू श्याम आ गया।
03लुहाच परिवार का आगमन
इस कस्बे में लुहाच गौत्र के प्रथम पुरुष राधू राम 1950 ईस्वी में सीकर जिले के सारगोथ गाँव से में आए थे। राधू राम से अब तक खाटू श्याम में लुहाच गौत्र की 4 वीं पीढ़ी चल रही है।
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