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नीमली

चरखी दादरी · हरियाणा

चरखी दादरी का नीमली गाँव ऐतिहासिक रूप से लुहाच गोत्र से जुड़ा एक मध्यम आकार का गाँव है। यहाँ की लोक-स्मृतियों में पैंतावास से हुआ पलायन, दादा भैया के मंदिर की मान्यता और पहलवान आड़िया की कहानियाँ आज भी जिंदा हैं।

31 अनुच्छेद6 तस्वीरेंगाँव की वंशावली →
नीमली — सामूहिक आयोजन

सामूहिक आयोजन · हमारे संग्रह से 1 / 2

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गाँव का मुख्य रकबा लुहाच गौत्र के पास है तथा सिंचाई नहर, ट्यूबवेल और फव्वारा प्रणाली से होती है।

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परंपरा के अनुसार पैंतावास में हुए घटनाक्रम के बाद ओनाड़ा राम के पुत्रों ने नीमली में बसने की शुरुआत की।

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नींबू राम के पुत्रों थाना राम और भाऊ राम के नाम पर गाँव में 'थानाण' और 'भावाण' पाने बने।

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नीमली का भूगोल और जनसांख्यिकी

नीमली चरखी दादरी से लगभग 16 किलोमीटर दूर स्थित है, जिसकी आबादी लगभग 7000 है। यहाँ की सिंचाई नहरों, ट्यूबवेल और फव्वारा प्रणाली पर निर्भर है तथा लुहाच गौत्र का खेड़ा है।

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धार्मिक स्थल और जनसुविधाएं

गाँव में दादा भैया का मंदिर और शिव मंदिर प्रमुख धार्मिक स्थल हैं, जहाँ मेला और पूजा आयोजित होती है। इसके अतिरिक्त गाँव में स्कूल, चौपाल, आयुर्वेदिक और पशु अस्पताल जैसी सुविधाएं भी हैं।

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नाँधा और पैंतावास का इतिहास

गाँव की वंशावली के अनुसार लुहाच पूर्वज नाँधा से निकले थे, जहाँ से पहाड़ सिंह ने पैंतावास बसाया। पैंतावास में सौ वर्षों तक रहने के दौरान अन्य गौत्र भी वहाँ आकर बसे।

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पैंतावास से प्रस्थान और नीमली का उद्भव

भूमि कर विवाद के चलते ओनाड़ा राम के परिवार ने पैंतावास छोड़ा और उनके बेटे लगभग 1600 ईस्वी में नीमली आए। उनके भानजे रुलिया राम ने रुलियावास बसाया, जिससे नीमली का आपसी भाईचारा बना हुआ है।

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छू छू राम का प्रवास

ओनाड़ा राम के छोटे बेटे छू छू राम नीमली से छुछकवास गए और बाद में झज्जर के पास मारोत गाँव में बस गए।

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गाँव के पाने और सामाजिक विकास

नींबू राम के पुत्रों थाना राम और भाऊ राम से थानाण और भावाण पाने तथा उनके मोहल्ले बने। गाँव में शिक्षा का स्तर बेहतर रहा है और लोग कृषि के साथ सरकारी व सैन्य सेवाओं में कार्यरत हैं।

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आड़िया पहलवान की लोककथाएं

गाँव में अविवाहित और निर्भीक आड़िया पहलवान के किस्से प्रसिद्ध हैं, जिन्होंने लुटेरों से गाँव की रक्षा की थी। उन्होंने दंगल में एक विरोधी पहलवान को भी परास्त किया था।

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अन्य गाँवों में विस्थापन

समय-समय पर नीमली से परिवारों ने अन्यत्र प्रवास किया, जिनमें रेवाड़ी खेड़ा, कबूलपुर और रानीला गाँव शामिल हैं।

हर परिवार की कहानी मायने रखती है।

अपने गाँव की जानकारी, परिवार का छूटा हुआ रिश्ता या किसी प्रियजन की स्मृति साझा करें।

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