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नीमली

रोहतक · हरियाणा

चरखी दादरी जिले का नीमली गाँव ऐतिहासिक रूप से लुहाच गोत्र से जुड़ा है। स्थानीय वंशावली के अनुसार, पैंतावास से आए पुरखों ने इस बस्ती की नींव रखी, जिसके बाद समय के साथ यहाँ विभिन्न पाने और मोहल्ले बसते चले गए।

33 अनुच्छेद0 तस्वीरेंगाँव की वंशावली →
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गाँव में लुहाच गौत्र के अलावा अन्य कई गौत्रों के लोग भी रहते हैं और यहाँ दादा भैया का प्रमुख मान्यता प्राप्त मंदिर है।

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नीमली का विभाजन थानाण और भावाण नामक दो प्रमुख पानों तथा उनके विभिन्न मोहल्लों में हुआ है।

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परंपराओं में आड़िया पहलवान के किस्सों और विभिन्न पीढ़ियों में अन्य गाँवों की ओर हुए प्रवासन का उल्लेख मिलता है।

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गाँव की स्थिति और सुविधाएँ

नीमली चरखी दादरी से लगभग 16 किमी दूर स्थित है जहाँ सिंचाई नहर और ट्यूबवेल पर निर्भर है। यहाँ दादा भैया का मंदिर, कई जोहड़, स्कूल और अस्पताल जैसी सुविधाएँ मौजूद हैं।

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पैंतावास की पृष्ठभूमि

अभिलेख के अनुसार लुहाच पूर्वज नाँधा से पैंतावास आए थे, जिसकी स्थापना पहाड़ सिंह ने की थी। बाद में जींद रियासत के दौर में कर संबंधी विवाद के चलते ओनाड़ा राम के वंशजों ने वह स्थान छोड़ दिया।

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नीमली और रुलियावास का बसना

ओनाड़ा के बेटे नींबू राम नीमली आए, जबकि उनके भांजे रुलिया राम ने पास ही रुलियावास गाँव बसाया। इसी रिश्ते के कारण दोनों गाँवों के बीच आपसी भाईचारा बना हुआ है।

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पाना, मोहल्ले और आड़िया पहलवान

नींबू राम के बेटों के नाम पर गाँव में थानाण और भावाण पाना बने, जिनसे आगे कई मोहल्ले विकसित हुए। परंपरा में आड़िया पहलवान की वीरता से जुड़े किस्से भी दर्ज हैं।

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ऐतिहासिक प्रवासन

विभिन्न पीढ़ियों के दौरान नीमली के दोनों पानों से कई परिवार रेवाड़ी खेड़ा, कबूलपुर और रानीला जैसे गाँवों में जाकर बस गए।

हर परिवार की कहानी मायने रखती है।

अपने गाँव की जानकारी, परिवार का छूटा हुआ रिश्ता या किसी प्रियजन की स्मृति साझा करें।

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